(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.45. अध्यायः 045
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
वराहावतारकथनम्॥ 1॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच॥

प्रादुर्भावसहस्राणि समतीतान्यनेकशः।
यथाशक्ति तु वक्ष्यामि शृणु तान्कुरुनन्दन॥ 2-45-1(13129)
पुरा कमलनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि।
पुष्करे यत्र सम्भूता देवा ऋषिगणैः सह॥ 2-45-2(13130)
एष पौष्करिको नाम प्रादुर्भावः प्रकीर्तितः।
पुराणैः कथ्यते यत्र वेदश्रुतिसमाहितः॥ 2-45-3(13131)
वाराहस्तु श्रुतिसुखः प्रादुर्भावो महात्मनः।
यत्र विष्णुः सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः॥ 2-45-4(13132)
उज्जहार महीं तोयात्सशैलवनकाननाम्।
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुर्दन्तश्चितीमुखः॥ 2-45-5(13133)
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः।
अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाङ्गः श्रुतिभूषणः॥ 2-45-6(13134)
आज्यनासः स्रुवं तुण्डं सामघोषस्वनो महान्।
धर्मसत्यमयः श्रीमान्कर्मविक्रमसत्कृतः॥ 2-45-7(13135)
प्रायश्चित्तमुखो धीरः पशुजानुर्महावृषः।
औद्गात्रहोमलिङ्गोऽसौ पशुबीजमहौषधिः॥ 2-45-8(13136)
बाह्यन्तरात्मा मन्त्रास्थिविकृतः सौम्यदर्शनः।
वेदिस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्याभिवेगवान्॥ 2-45-9(13137)
प्राग्वंशकायो द्युतिमान्नानादीक्षाभिरूर्जितः।
दक्षिणाहृदयो योगी महाशास्त्रमयो महान्॥ 2-45-10(13138)
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रावर्ग्यावर्तभूषणः।
शालापत्नीसहायो वै मणिशृङ्गसमुच्छ्रितः॥ 2-45-11(13139)
एवं यज्ञवराहो वै भूत्वा विष्णुः सनातनः।
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम्॥ 2-45-12(13140)
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः।
मज्जन्तीं सलिले तस्मिन्स्वदेवीं पृथिवीं तदा॥ 2-45-13(13141)
उज्जहार विषाणेन मार्गण्डेयस्य पश्यतः।
शृङ्गेण यः समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया॥ 2-45-14(13142)
सहस्रशीर्षो देवेशो निर्ममे जगतीं प्रभुः।
एवं यज्ञवराहेण भूतभव्यभात्मना॥ 2-45-15(13143)
उद्धृता पृथिवी देवी पूज्या वै सागराम्बरा।
निहता दानवाः सर्वे देवदेवेन विष्णुना॥ 2-45-16(13144)
वाराहः कथितो ह्येष नारसिंहमतो शृणु।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः॥ ॥ 2-45-17(13145)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 45 ॥


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